The Unbroken Spirit: Shalini's Turbulent Journey

 Shalini, a radiant star in her school's constellation, was more than just a brilliant mind. Her eloquence, both in speech and debate, captivated audiences, and her compassionate heart endeared her to all. Teachers admired her intellect, classmates revered her wisdom, and friends cherished her unwavering loyalty.

Shalini, your speech on environmental conservation was truly inspiring, her teacher, Mr. Patel, commended her after a particularly successful debate. "Your passion for the world around you is evident.

Thank you, sir, Shalini replied, her eyes sparkling with pride. I believe it's our duty to protect our planet.

Shalini's home was a sanctuary of love and harmony, nurtured by her devout mother and supportive brother, Raj. Their bond was unbreakable, forged through shared experiences and unwavering trust.

Shalini, remember, no matter what life throws at you, always hold onto your faith, her mother, Mrs. Gupta, would often remind her. "It will guide you through the darkest of times.

Tragedy struck the Gupta family when Shalini's father passed away unexpectedly. The loss was a devastating blow, but it only strengthened the family's bond. Together, they mourned, healed, and learned to cherish the precious time they had left.

Years later, as Shalini transitioned into adulthood, her philanthropic spirit continued to shine. She volunteered at local charities, organized community events, and became a beacon of hope for those in need.

Shalini, you're a true inspiration, her friend, Amita, said. Your dedication to helping others is admirable.

But fate had other plans. A series of unfortunate events shattered Shalini's world. Her mother's untimely passing left her feeling adrift, and her brother's marriage to the manipulative Kavya brought darkness into their lives.

Shalini, you're so naive, Kavya sneered, her voice dripping with contempt. You think everyone is as kind as you are.

Despite the hardships she faced, Shalini refused to be defeated. She discovered a hidden strength within herself and embarked on a journey of self-discovery. With unwavering determination, she started a small online food business, pouring her heart and soul into every dish.

I won't let anyone dictate my destiny, she vowed to herself.

As her business grew, so did her reputation. Shalini's culinary creations became renowned for their taste and authenticity. She was invited to participate in food festivals, featured in local newspapers, and even appeared on television.

Shalini, you've achieved so much, her friend, Amita, said, beaming with pride. You're an inspiration to us all.

But just as Shalini's life seemed to be turning around, tragedy struck again. Raj, her beloved brother, was involved in a fatal car accident. The news was a devastating blow, and Shalini's world was once again shattered.

In a surprising turn of events, Shalini decided to take Kavya in, hoping to offer her a chance at redemption. Initially, Kavya seemed to have changed, but her manipulative nature soon resurfaced. Shalini's kindness was exploited, and she found herself trapped in a cycle of emotional abuse.

I'm so tired, Shalini whispered to herself, tears streaming down her face. I just want this to end.

One fateful night, Shalini's heart could no longer bear the pain. She passed away peacefully, leaving behind a legacy of resilience, kindness, and an unwavering spirit.

Years later, Kavya, now an old woman, sat alone, reflecting on her past. She realized too late that Shalini's goodness had been genuine, and her own actions had led to devastating consequences.

Why did I destroy someone so pure? she whispered, tears streaming down her face.

Shalini's story serves as a poignant reminder that even in the face of adversity, the human spirit can endure. Her unwavering belief in the power of kindness and her relentless pursuit of happiness inspire us all to never give up, no matter how challenging life may become.

 

एहसास तेरा मीठा सा

एहसास तेरा मीठा सा, मेरे मन को प्रफुल्लित करता है
और तेरे एक छुवन से, मेरे हृदय को विचलित करता है
है नई-नई ये फुलवारी, भवरें भी गुंजन करता है
और अपने रसपान से मुझको, प्रतिपल पुलकित करता है
है नया नया ये सम्मोहन, मुझे खुद से जुदा सा करता है
और तेरी ही मुस्कान पर पल पल, ये आहें भरता रहता है
कुछ ख़ास नहीं पर बात तो है, तेरी सादगी में कोई बात तो है  
हे राज दफ़न जो सीने में, तेरा अस्क बयां सब करता है
कुछ तो खाली है जीने में, जो तेरा दर्द बयां सा करता है

Jyoti Gupta

कुछ अधूरा सा पाती हूँ

रोज सुबह जब खुद को देखूं कुछ सुना सा पाती हूँ।
मन के एक विव्हल कोने में कुछ अधूरा सा पाती हूँ।।
लगते सब अपने सच्चे है, पर ये तो आँखों का धोखा है।
मत खोज निगाहें तू उनको, ये भ्रम दुनियां का झोँका हैं।।
बड़ी विघ्न समस्या जीवन की धीरे से घात जमाती है।
दुनियां की ताल-तल्लैया में सबको ये नाच नचाती है।।
क्या जिक्र करूँ खुद का खुद से, हरबार नया कुछ पाती हूँ।
दुनियां के रंगी इस मेले में, मैं खुद को ही अकेला पाती हूँ।।
नाहक लोग बात बनाते है, कुछ तीखा व्यंग सुनाते है ।
अपमान होता है गिरधर जब अपने कटाक्ष कर जाते है।।
भारी विपदा है मन की, किस-किस को ये समझाऊं मैं।
और भीतर की उमड़ती ज्वाला को, कैसे शांत कराऊँ मैं।।
94b80-saudade

Jyoti Gupta

विरह

इस विरह वेदना में, खुद को तड़पाती हूँ,
तुझसे मिलने के सौ बहाने, मैं बनाती हूँ।
मैं समझ ना पायी थी तुमको,
जब बिछडन-बिछडन कहते थे|
धीरे-धीरे खुद को मुझसे,
दूर तुम जो पल-पल करते थे|
मैं समझ सकी न तेरी माया,
जब तू झूठे वादें करता था|
और पर स्त्री से छिप कर,
तू घंटो भर बातें करता था|
तेरी एक मुस्कान पर मैं,
तेरी जोगन बन बैठी थी|
और तेरी दर्शन के खातिर,
मेरी अँखियाँ तरसा करती थी|
 ज्योति गुप्ता
jcreativesilverproduction@gmail.com

 Related image

एहसास तुम्हरा है....

भूल सकूँ ना बीती बातें, मुझे एहसास तुम्हारा है।
यौवन के काले नैनो में, बरसात तुम्हरा है।।

जो की थी अठखेलियां संग तेरे, वो पल तुम्हारा है।
विरहा के तनहा राहों में, बस साथ तुम्हारा है।।
भूल सकूँ...............................एहसास तुम्हरा है|
तुम छोड़ गए सब तोड़ गए, वो दर्द तुम्हारा है।
सीने में चुभी जो आग मेरे, वो आह तुम्हारा है।।
भूल सकूँ...............................एहसास तुम्हरा है|
सब कुछ जानू अन्तः मन में फिर भी, एक आस तुम्हारा है।
मैं भूल सकूँ न तेरी यादें, बस एहसास तुम्हारा है।।
भूल सकूँ...............................एहसास तुम्हरा है|
ज्योति गुप्ता
jcreativesilverproduction@gmail.com




यौवन के चौखट पर खड़ी लड़की

काला-गोरा क्या भेद है, ये समाज मुझको बतलाती है।
जब पिता जी के कहने पर, मुझे जमात देखने आती है।।

रंग काला है कद छोटा है, और बालों का रंग भी सुनेहरा है।
कैसे ले ले तुम्हारी बेटी, जब जेब में तुम्हारे ना पैसा है।।
तू देख मेरा आडम्बर ऊँचा, क्या ऊँचा महल बनाया है।
अब कुछ तो समझो समधी जी, लड़के पर पैसा बहुत लगाया है।।
ये हाल जो देखूं हर घर का, चर्चे मुझको बतलाती है।
काला गोरा क्या भेद है, ये समाज मुझको बतलाती है।।

उम्र बढ़ रही लड़की की ये दुनियां सब बतलाती है।
यौवन के चौखट पर खड़ी लड़की, कहा संभाली जाती है।।
मैं अपने मुख से नहीं कहता, ये बात तो सदियों पुरानी है।
जब-जब लड़की की शादी हुई, लड़को ने ही की मनमानी है।।
मैं मुड़ कर देखूं जब सखियों को, उनके चहरे बतलाती है।
काला गोरा क्या भेद है, ये समाज मुझको बतलाती है।।

Image result for rishtedar  wale wallpaper

ज्योति गुप्ता
jcreativesilverproduction@gmail.com

अच्छा लगता है

हैं पड़ी बेड़ियाँ पाओं में, सपनो पर सर्वाधिकार नहीं।
ना रोक सकूँ खुद के मन को, क्या करुँ वो निराधार नहीं।।
कितनी पाबंदियां हो जीने में, अच्छा लगता है।
क्या करूँ साहिब लाचार हूँ आदत से, पर लिखना, अच्छा लगता है।।

तन घायल है मन पीड़ित है, फिर भी हार का नाम नहीं।
अपनी इच्छा से बढ़ना है, जीना है ये कोई अपराध नहीं।।
काले बादल विघटित करके जब, सूरज आसमां से निकलता है, अच्छा लगता है ।
क्या करूँ साहिब लाचार हूँ आदत से, पर लिखना अच्छा लगता है।।

चाहे छिन लो आभूषण मेरे या, सितम की बारिश बरसा दो।
चाहे छिन लो कलम ये मेरी. या चाहे मुझको कहीं दफना दो।।
अब बंद पिंजड़े में भी जीना, अच्छा लगता हैं।
क्या करूँ साहिब लाचार हूँ आदत से, पर लिखना अच्छा लगता है।।
Related image

ज्योति गुप्ता
jcreativesilverproduction@gmail.com



ईश्वर की सुन्दर रचना हूँ।


काली-चंडी, अल्का-दुर्गा,  मैं सबकी एक ही महिमा हूँ।
मैं सृस्टि हूँ, मैं दृस्टि हूँ, मैं ही तेरी संरचना हूँ।।
विघटित भी मैं संगठित भी मैं, मैं काल की काली कल्पना हूँ।
तू मान सके तो मान की मैं ईश्वर की सुन्दर रचना हूँ।।

नभ, जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी, पंच तत्वों का मिश्रण मैं हूँ।
अवलोकन हूँ आधार भी हूँ अगणित समाज की सूत्रधार भी हूँ ।।
दर्पण भी मैं, अर्पण भी मैं, सौभाग्य की सारी कल्पना हूँ।
तू मान सके तो मान की मैं ईश्वर की सुन्दर रचना हूँ।।

ज्योति गुप्ता

आहुति

Image result for agnikund me lladka ladki

पंडित जी के मंत्रो से मंडप गूंज रहा था। भावुकता से भरी हुई मेरी माँ की ऑंखें आंसुओं की मोती से टिमटिमा रही थी। उनके मुख मंडल पर विराजित उस भाव से मैं उनकी ख़ुशी का आभास कर रही थी। मेरा ह्रदय उत्साहित था।एक तरफ सबसे बिछड़ने जाने का गम था तो दूसरी तरफ जिंदगी की नई शुरुआत मेरी राहें देख रही थी। चारों तरफ खुशियों का माहौल था मेरे पिता जी को तो जैसे उन्हें उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी से मुक्ति मिल गयी हो या यूँ कह लो कि उनका कोई अधूरा सपना पूरा हो गया हो लेकिन अभी भी कुछ खाली सा था। इतने दिनों तक मैंने जो भी अर्जित किया था, जो भी संचित किया था, ऐसा लग रहा था मानो कि मंडप में प्रज्वल्लित उस अग्नि में, मैं एक-एक करके अपने ख्वाबों और अरमानों  की आहुति दे रही हूँ।
सहसा अम्मा की आवाज आई "बिटियां तुम्हारे पापा आये हैं" और इतना सुनकर मैं अपनी सपनों की दुनियां से जाग खड़ी हुई। मन की विव्हळता ऐसी थी कि मानों जो भी मैंने सपना देखा वो सच था। मैंने अपना बैग और कागज का लिफाफा उठाया और वेटिंग रूम की तरफ गयी जहाँ मेरे पिताजी मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
पिता जी सामने कुर्सी पर बैठे हुए थे। मैं उनको देख कर झट गले लगने के लिए उनकी तरफ दौड़ी परन्तु मेरे आगे बढ़ने से ही उन्होंने कहा "अरे बेटा मैं कबसे तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ, जल्दी चलो वर्ना हमारी ट्रैन छूट जाएगी।" अपने पिता जी कि ये बात सुनकर मैं उदास हो गई और उनसे कुछ कहे ब्गैर मैं उनके साथ स्टेशन कि तरफ चल पड़ी। सफर में हमने एक दूसरे से कोई बात नहीं की। पिता जी अपने अख़बार में व्यस्त थे और मैं अपने ख्यालों में। मैं उनसे बहुत कुछ कहना चाहती थी पर कुछ कह पाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अभी मैं इसी असमंजस में थी की हमारा स्टेशन आ गया। मैंने जैसे ही ट्रैन से उतरकर स्टेशन पर ज्यों ही पैर रखा, ढोल-नगाड़ों की आवाज गुजने लगी। स्टेशन पर खड़ा निहाल और शेखर मुझे देखते ही देखते अपने कंधे पर बिठा लिया और चारों तरफ बधाइयों दी जाने लगी। मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा कि जो बात मैं अपने पिता जी से कहना चाहती थी वो बात उन्हें पहले से ही पता है। मेरे आँखों से आसुओं की धरा निकलने लगी। खुशी-खुशी हम घर पहुंचे।  घर पंहुचा तो नज़ारा ही कुछ अलग था। मेरा पूरा घर फूलों और लड़ियों से सजा हुआ था। सारे रिश्तेदारों का घर पर ताता लगा हुआ था| अचानक से मेरे चाचा कि बेटियां दौड़ती हुई मेरे गले लग गयी। और माँ आरती कि थाल से मेरी आरती उतारने लगी।
माँ ये सब छोडो भी क्या कर रही हो?
तू नहीं समझेगी, मैं तेरी नज़र उतार रही हूं ताकि तुम्हे किसी कि नज़र ना लगे। ओफ्हो माँ आप भी ना.. अच्छा  माँ ये घर इतना सजाया क्यों गया है?  मैं  कलक्टर बनी हूँ इसी की खुशी मे यह सब आयोजित किया है या फिर कही मेरी शादी तो नही कर रहे। जैसे ही मेरे वाक्य पुरे हुऐ कि  माँ ने अचंभित होकर मेरी तरफ देखा और कहाँ " हाँ  बिलकुल सही कहाँ सुशीला तीन दिन में तुम्हारी शादी है। लड़का बहुत अच्छा है, अच्छे पैसे कामता है और नामी गिरामी परिवार है, तुम्हे हर तरफ से सुखी रखेगा.. कलक्टरी में क्या रखा है। अब जा जाकर मुँह हाथ धो ले, और कुछ खा ले, अभी बहुत सारी रश्में करनी बाकी है।" माँ की बातें सुनकर मेरा मन स्थिर हो गया। मैं शून्य अवस्था में चली गयी और जिस लिफाफे को पकडे हुए मैं कॉलेज से घर तक आयी वो तिनके की भांति मेरे हाथ से छूट कर दरवाजे  की चौखट पर जा गिरा।|
शादी की सारी रश्में शुरू हो गयी। हल्दी की रश्म, फिर मेहँदी की। ढोल-नगाड़े बजने लगे, लोगो का आना- जाना शुरू हो गया। निहारिका मुझे मंडप में ले जाने के लिए आयी। मेरी सारी सहेलियां खुश थी। कोई मुझे छेड़ता तो कोई मुझे बातें कहता। मंडप पंडित जी के मंत्रो से गूंज उठा। चारों तरफ खुशहाली थी| भावुकता से भरी हुई मेरी माँ की ऑंखें आंसुओं की मोती से टिमटिमा रही थी। उनके मुख मंडल पर विराजित उस भाव से मैं उनकी ख़ुशी का आभास कर रही थी। मेरा ह्रदय शान्त था। ना ही मुझे किसी से बिछड़ने का गम था और नाहीं दूसरी तरफ जिंदगी की नई शुरुआत करने की खुशी थी। चारों तरफ खुशियों का माहौल था मेरे पिता जी को तो जैसे उन्हें उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी से मुक्ति मिल गयी हो या यूँ कह लो कि उनका कोई अधूरा सपना पूरा हो गया हो लेकिन अब सब कुछ खाली सा था। इतने दिनों तक मैंने जो भी अर्जित किया था, जो भी संचित किया था, ऐसा लग रहा था मानो की मंडप में प्रज्वल्लित उस अग्नि में, मैं एक-एक करके अपने ख्वाबों और अरमानों  की आहुति दे रही हूँ।

हाँ सच मे, मैं आहुति दे रही हूँ।



ज्योति गुप्ता

बलिदान


ईंजन की सिटी से मेरी आँख खुली और खिड़की से झाँक कर देखा तो मुझे तनिक भी विश्वास नही हुआ कि यह मेरा ही गांव है जिसे छोड़ कर मैं बरसो पहले शहर चला गया था| सब कुछ बदल गया था ऐसा लग रहा था कि मैं अपने गाँव नही बल्कि कही और ही आ गया हूँ| मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैं और राहुल इस गावँ के चप्पे चप्पे में घुमा करते थे, और हमारी शरारते इतनी थी कि पडोसी का गाँव भी हम दोनों से परेशानरहता था| एक ही साथ हम दोनों पाठशाला जाने के बहाने घर से निकलते और दूर कहीं खेत में औरो के साथ कंचें खेला करते थे तो कभी बगीचों से चुपके चुपके आम तोड़ा करते थे, और पकडे जाने पर पिता जी जो पिटाई किया करते थे कि पूछो मत! मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैंने राहुल के संग कॉलेज में दाखिल लिया ही था और माँ ने मुझे अपने हाथों से लड्डू बना कर दी और बड़े हिदायत के साथ मुझसे कहा कि “यह लड्डू मामा को दे आना उन्हें ये लड्डू बहुत अच्छे लगते है| “ माँ ने रास्ते में जाने के लिए ५ रूपये दिए थे कि अगर रास्ते में भूख लगे तो कुछ खा लेना| हमने भी माँ के हाथ से लड्डू लिया और मामा के गाँव कि तरफ निकल पड़े| पर हम अकेले जाते भी तो कैसे हमारा चड्डी बड़ी यार तो अपने घर पर आराम फरमा रहा था| हम उसके घर गए और फिर क्या अब सफर भी था और सफर में साथ निभाने वाला मेरा मित्र राहुल भी था| करीब दोपहर के २ बज रहे थे| भरी दुपहरी में जान निकले जा रही थी आस पास कही कुआं भी न नजर आ रहा था कि उससे अपनी प्यास भी मिटाई जाय| हम दोनों थक कर एक पीपल के पेड़ के निचे बैठ गए| मारे प्यास के गला सूखा जा रहा था| अभी हम दोनों ने दम भी न भरा था कि मुझे कुछ आवाजें सुनाई दी और वो आवाज पास के ही गाँव से आ रही थी| फिर क्या था मैंने ना आव देखी ना ताव मैंने झट झोला उठाया और भाग खड़ा हुआ| इधर राहुल भी अपने पजामे को सही करता हुआ मेरे पीछे दौड़ा| वहां पहुँच कर नजारा देखने लायक था|पुरा गाँव दुल्हन की तरह सजा हुआ था मानो जैसे की किसी राजा की शादी हो रही हो| हर तरफ सुन्दर सुदर फूल लगे थे, हर कौने से गुलाबो की खुशबू आ रही थी और हर कोई नए रेशमी कपड़ो में चमक रहा था| अब मुझे ना भूख की सुध थी और नाही प्यास की| उस गाँव की सुंदरता ने मानो मेरेमन को कैद कर लिया हो| अभी हम दोनों इस रमणीय दृश्य को देख कर मंत्रमुग्ध ही थे कि सामने से लड़कियों का एक झुंड आया और मुझसे टकरा गया मेरे हाथ से झोला गिर गया और सारे लड्डू जमीन पर गिर गएअभी मुझे कुछ समझ में आता उससे पहले कि आवाज आयी कि “हुजूर आपका घुरना अगर बंद हो गया हो तो हमारा दुप्पटा छोड़ दीजिये” मैंने कहाँ जी”क्या कहाँ अपने? मैंने तो कोई दुपट्टा नही पकड़ा आपक?” लड़की ने कहाँ अच्छा उल्टा चोर कोतवाल को डाटें दुप्पटाहाथ में हैऔर जनाब कि हिमाकत देखो जरा, साफ़ झूठ बोल रहे हैं!इतना कहकर लड़की ने अपना दुप्पटा मेरे हाथ के कड़े से छुड़ाई और घूरती हुई चली गयी!  मैं इस स्थितिमें नही था कि मैं कुछ समझ सकूँ!मैं तो उस बलां कि खूबसूरत लड़की के नूर पर फ़िदा हो गया था! जिस नजाकत से वो मेरे पास आयी वो मेरे रूह तक को छू गयी! अब तो मुझे गावँ कि खूबसूरती भी कम लगने लगी थी! अब ना मुझे माँ के दिए हुए लड्डूओ कि फ़िक्र थी ना ही अपने मित्र राहुल की जो कबसे जमीन पर गिरे हुए लडडुओ को उठाये जा रहा था! अचानक से राहुल ने मुझे झकझोरा और कहाँ अर्जुन अगर तुम्हारी प्यास मिट गयी हो तो आगे चले मारे प्यास के अब मुझसे एक कदम ना चला जायेगा! थोड़ी कदम पर ही एक कुआं दिखाई दिया जहाँ हम दोनों ने पानी पीकर प्यास बुझाई! तभी राहुल ने कहाँ यार अर्जुन भाई, मालूम होता है कि किसी नवाब कि शादी होने वाली है इसीलिए इस गावँ को दुल्हन कि तरह सजाया गया है! मैंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी ऐसी भव्य शादी नही देखी! मैं क्या कहता हूँ अगर हम आज मामा के घर ना जाकर इस शादी में सरीक हो जाय तो मजा का मजा और तरह तरह के पकवान भी खाने को मिल जायेंगे! मैंने भी राहुल कि बात सुनकर हां भर दी और निकल पड़े हवेली तरफ! मुझे तो इस शादी में कोई रूचि नही थी और नाही छप्पन भोग पकवान में! मुझे तो बस तड़प थी तो उसकी एक झलक कि जिसने मेरा चैन और सुकून अपनी मुस्कान में ले गयी! धीरे-धीरे शाम हो गयी! पुरा गाँव दियों कि रोशनी से चमक उठा, चारो तरफ सहनाइयां बज रही थी और हम दोनों बाकी लोगो के बीच में भीड़ बनकर रह गए थे! इधर राहुल को भूख बहुत जोरो कि लगी थी उसने आव ना देखी ताव और तुरंत हो रही दावत की तरफ कूद पड़ा जब तक कि मैं उसे रोकता वो आगे निकल पड़ा था! मैं इधर बैचैन इतना कि बस उसकीएक झलक मिल जाए तो मेरे लिए किसी दावत से कम ना था!  मैंने हर कौने कौने में उसे ढूंढा पर वो कही ना दिखी! अचानक से किसी ने आवाज लगाई  कि मियां एक मदद चाहिए वहाँ कौने में फूलो कि गठरी पड़ी हुई है जरा उसे अंदर कमरे में पंहुचा दीजिये! मैंने भी जी जरूर कहकर सामने रखी हुई गठरी उठाई और कमरे  में ले जाकर रख दी! मैं जैसे ही वहाँ से निकलने ही वाला था कि पीछे से किसी ने आवाज दी! अजी जनाब तक्कलुफ़ के लिए माफ़ी चाहते है पर अगर आप हमारा एक काम कर दे तो बहुत बड़ी मेहरबानी होगी! देखिये ना ये पर्दा तभी से अटक ही गया है कितना भी जोर लगा लिया पर आगे बढ़ता ही नही नवाब साहब अगर आ गए और ये ठीक ना हुआ तो उनके कहर से खुदा ही बचाय! मैं पीछे मुड़ा और उस महिला के पास पंहुचाऔर कहाँ आप निचे उतर जाये मैं देखता हूँ! मैं पास कि रखी हुई मेज पर चढ़ गया पर्दा काफी ऊँचा था आसानी से हाथ भी नही पहुँच पा रहा था मैंने कहाँ जरा वो डंडादेंगीमेरा हाथवहां तक नही पहुँच पा रहा है!  लड़की ने डंडा थमाया! मैं अपने काम में मसरूफ था ! मैं पर्दे को डंडे के सहारे आखरी छोर तक खिंचा और मेज से निचे उतर गया और उस लड़की को डंडा देकर कहाँ जी हो गया अब आपको डरने की कोई जरुरत नही मैंने ठीक कर दिया हैऔर वहाँ से चलने लगा तभी पीछे से आवाज आयी "जी जनाब मेरा दुपट्टा...." मैं पीछे मुड़ कर देखा तो पाया ये वही लड़की थी जिसको मैं हर जगह तलाश  कर रहा था! मैं एक पल के लिए स्तभित रह गया लड़की धीरे से मेरे पास आयी और अपने दुपट्टे को मेरे हाथ से छुड़ाकरदूर जाकर कहाँ "जी जनाब मदद के लिए शुक्रिया"!
उसकी आवाज सुनकर मेरे चेहरे पर एक अलग सी मुस्कान आ गयी और उस खुशीकी कोई सीमा नही थी! मैंने उत्सुकता से उसको जवाब दिया "आपकी खिदमत में ये बंदा हमेशा हाजिर है मल्लिका"! और वो एक मुस्कान देती हुई वहाँ से चली गयी! मैं कमरे से बहार निकला! मेरे चेहरे पर एक अलग ही चमक थी! उस दिन मुझे पहली बार ऐसा एहसास हुआ की मैं कुछ अलग सा महसूस कर रहा हूँ जो मैंने आज तक महसूस ना किया! अभी मैं अपने ही ख्वाबो में था की राहुलने पीछे से मुझे पकड़ कर कहाँ अरे भाई तुम अपने ही ख्वाबो में हो! आज कहाँ खोये खोये से होचल आजा,खानाबहुत लजीज बना है, कसम बजरंग बली की इतना जयेकेदारखाना मैंने अपनी पूरी जिंदगी में नही खाया! पर उस दिन तो ना मुझे भूख थी और ना ही चैन! मैं तो बस उस मल्लिका के ख्वाबों में गुम था! धीरे धीरे हम उस शादी के पंडाल से बहार आ गए रात बहुत हो चुकी थी और दूसरे गाँव जाने के लिए रात का वक़्त भी सही नही था, पास के ही एक मकान के सामने खाट पड़ी थी बस हम दोनों वही लेट गए! राहुल तो पड़ते ही सो गया पर मुझे उस रात नींद ही नही आयी! खुले आसमान के नीचे मैं सो रहा था और आसमान में फैले हर तारो में मुझे वो दिखाई दे रही थी! रात काटे ना कट रही थी पर जैसे तैसे नींद लग गयी!
अगली सुबह कोई पानी की छींटो से जगाये जा रहा था आँख खुली तो सामने देखा की वही लड़की मेरे नज़रों के सामने हैं! मेरे तो होश ही उड़ गए थे मानो ईश्वर मुझपर मेहरबान हो गया है मैं खाट से उठ कर बैठा और घबराते हुए लफ्जो में बोला " जी आप यहाँ कैसे?"
उसने कहाँ "जी जनाब यह मेरे अम्मी अब्बू का घर है! आप भी झुपे रुस्तम है कल दुपट्टा क्या पकड़ा आप घर तक पहुँच गए बहुत पहुचें हुए लगते हैं!
मैंने भी नवाबो के अंदाज में कहाँ " जी हम अगर चाह दे तो खुदा का पता भी ढूढ़ लाये फिर आप तो हमारी मलिक्का......
तभी उसने कहाँ "जी क्या कहाँ अपने?"
मैंने तुरंत बात पलटते हुए कहाँ मतलब की आप तो हुस्न की मलिक्का है आपका पता भला कैसे ना ढूढते!
वो शरमाती हुई अंदर चली गयी! इधर राहुल तभी से मुझे घूर रहा था मैंने उससे नजर बचाने की कोशिश की! पर उसने पूछ ही लिया कि आखिर ये माजरा क्या है अर्जुन, ये तो वही लड़की है जिसने मामा जी के लड्डू मिटटी मलित कर दिए थे! अजीब लड़की है हमारा पिछा कर रही है! अर्जुन भाई मुझे तोडरही लग रहा है इस बलांने कल लड्डू गिरायी थी कही आजहमें ना गिरा दे!
हमे तो ये भी कुबूल हैं कम से कम इसी बहाने उनका दीदार तो रहेगा....
राहुल ने कहाँ भाई साब आपके इशारे मुझे नेक नही लग रहे हैं! अब आप यही टीकेरहे तो घर में खामखाँ दिक्कत बढ़ जाएगी घर पर माँ इंतज़ार कर रही होगी जल्दी चल मामा को ये लड्डू भी तो देने है!
मैंने भी हामी भर दी और खाट से जैसे ही उतरा माँ के दिए हुए लड्डू फिर से जमीन में मिटटी मिलित हो गए!जैसे ही नीचे की तरफ झुक कर लड्डुओं को उठाने लगा तभी अचानक से वो मलिक्का मेरे गिरे हुए लड्डुओं को उठाने लगी मैं टकाटक उन्हें देखता ही रहा! सारे लड्डुओं को समेटने के बाद उसने लड्डुओं का झोला मुझे देते हुए कहाँ "जनाब ये रहे आपके लड्डू इन्हें संभाल कर रखिये जहाँ तहाँ गिर जाते हैं!
मैंने झोले को हाथ में पकड़ते हुए कहाँ "जी शुक्रिया"! इतना कह कर जैसे ही मैं आगे बढ़ा पीछे से आवाज आयी "जीजनाब मेरा दुपट्टा..."
मैं जैसे ही पीछे मुड़ा मेरे कड़े में फिर से उसका दुपट्टा फसा था जो शायद  लड्डुओं को उठातेवक़्त मेरे कड़े में उलझ गया था! वो मेरे पास आयी और अपने दुपट्टे को मेरे हाथ से झुड़ाकर दूर भाग गयी! मैंने कहाँ अजी एक बार अपना नाम तो बताते जाइये आपको देख ना सकेंगे तो कम से कम आपके नाम से तो हमे जीने का बहाना मिल जायेगा..
अजी नाम में क्या रखा है आखिरकार मिलने के लिए भी तो कोई बहाना चाहिए!  और इतना कहकर वो अंदर चली गयी! उसके बाद मैं राहुल आगे मामा के घर निकल पड़े! गाँव के चौराहे पर अभी हम पहुंचे ही थे कि पता चला कल रातही मामा कि तबीयत बहुत बिगड़ गयी थी और वो पास के गाँव में किसी हकीम के घर उन्हें ले जाया गया हैं!  माँ के दिए हुए ५ रूपये कबके खर्च हो गए थे अब तो वापिस जाने तक के पैसे नही थे कुछ सूझ नही रहा था कि तभी सामने से एक तांगा जा रहा था! उससे पूछा तो पता चला कि वो सामने वाले गावँ में ही जा रहा था लेकिन तांगे वाले को देने के लिए हमारे पास रूपये नही थे. फिर क्या माँ के लड्डुओं की क़ुरबानी देनी पड़ी! लड्डूओ से भरी झोली मैंने तांगे वाले को दे दी! फिर क्या करते धरते रात में हम गावँ पहुँचे बहुत समय लगने पर हमे हाकिम साहब का घर का पता मालूम हुआ! उनके घर जाकर देखा तो नज़ारा ही कुछ दूसरा था! हर जगह खोमीशी सी छायी थी बाहर द्वार पर उपले भी जल रही थी! जैसे ही अंदर कदम रखा तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी! मेरी  माँ कल रात को ही इस गावँ में मामा को देखने आयी थी और आज सुबह ही मामा का देहांत हो गया और ये सदमा मेरी माँ को बर्दास्त ना हुआ और वो भी इसदुनियां को छोड़ कर चली गयी! एक ही पल में मानो मेरा सारा संसार उजाड़ गया हो! राहुल ने मुझे बहुत संभाला! लेकिन मुझे यकीनही नही हो रहा थाकिएक ही झटके में इतना सब कैसे हो गया! मेरे आस पास कोई भी अपना ना दिखाई दे रहा था! पिता जी तो बचपन में ही गुजर गए थे मुझे मेरी माँ ने ही पाला था! किसी तरह गावँ वालो ने सारी व्यवस्था की और माँ और मामा का क्रिया-कर्म हुआ! मैं हताश होकर जमीनपर ही लेट गया था राहुल ने मुझे बहुत उठाने की कोशिश की पर मैं टस से मस ना हुआ! अचानक से एक लड़की की आवाज सुनाई दी! मैं जैसे ही मुड़ कर देखा तो पीछे वही खड़ी थी जिसको मैं अपना दिल दे बैठा था!  मुझे देखते ही वो झट से मेरे गले लग कर रोने लगी और मुझसे मिन्नतें करने लगी कि मुझे बचालो ये लोग मुझ बहुत मारते है, खुदा के लिए मुझे इनलोगो से बचाओ मैं नवाबों की गुलामी नही करना चाहती, ये लोग मेरे जिस्म को नोच-नोच कर खाते है मुझे इस नरख से बचाओ! अभी मैं कुछ समझ भी पाता कि कुछ लोग तलवार और हथियार के साथ मेरे सामने खड़े हो गए और उसे घसीट कर ले जाने लगे! मैं उनके पीछे दौड़ापर मुझे उनमे से एक शख्स ने रोकते हुए “कहाँ ये नवाब कि गुलाम है और नवाब के घर से भाग कर आयी हैइस बला से दूर ही रहना अगर नवाब को पता चला तो वो तुम्हारा सर धड़ से अलग कर देंगे!” मैं एक पल के लिए स्तम्भित रह गया पर फिर भी मैंने कहाँ “इंसानियत नाम कि चीज़ भी होती है आखिर ये एक औरत है और औरत के साथ ऐसा शुलूक करना वाजिब नही!” तभी उनमे से एक ने कहाँमियांआप हमे शुलूक और लहजे का पाठ मत पढ़ाइये, हमे अच्छे और बुरे का फर्क पता  है हमारे यहाँ ये शुलूक हर उन औरतो के साथ होता है जो बेटी जनती है! हमारे यहाँ बेटी पैदा करना अल्लाह कि नज़र में गुनाह है!  मेरे लाख मना करने पर उन लोगो ने रियायत नही बख्शी और उसे घसीटते हुए मेरी आँखों के सामने से ले जा रहे थे! अब ये बात मेरे बर्दास्त के बहार थी मैं दौड़ कर उसे छुड़ाने लगा! देखते ही देखते माहौल दंगों में बदल गया! मैं पूरी तरह से लहू लुहान हो चुका था और राहुल भी डंडो को मार से बेहोश हो गया था! अगले दिन मेरी जैसे ही आँख खुली तो एक छोटी बच्ची मेरे सामने बैठी थी और अपने हाथ में पानी का गिलास पकडे हुयी थी!उसने अपने प्यारी सी आवाज में कहाँ “आप ये पानी पी लीजिये”!
मैंने उसके हाथ से गिलास जैसेही पकड़ा उसने कहाँ "जनाब मेरा दुपट्टा!"मेरे हाथ से वो गिलास छूट गया! मैं पागलो कि तरफ इधर से उधर दौड़ने लगा! मैं बस उसे देखना चाहता था उससे बात करना चाहता था, उससे पूछना चाहता था कि आखिर ये सब हो क्या रहा है? लेकिन अचानक मुझे आवाज सुनाई थी पीछे पलट कर देखा तो वो बच्ची रोये जा रही थी! मैं उसको अपने गले से लगा कर पूछा क्या हुआ तुम रो क्यों रही हो? उसने कहाँ मेरी अम्मीवहाँ कुएं के पास सो रही है उसे उठा दो! मैं उसके साथ उस कुएं के पास गया! कल रात कि रौशनी में मुझे कुछ दिखा नही था लेकिनआज दिन के उजाले में धीरे धीरे मुझे वो सब कुछ दिखाई देने लगा वो कुआं जहाँ मैंने पानी पी थी, वो खाट जहाँ मैं और राहुल सोये थे वो घर जोशायद उसी लड़की का था, जहाँ मेरे मामा और मेरी माँ का देहांत हुआ था! कुएं के पास एक बेजान अचेतन रूप में एक महिला पड़ी हुई थी! उसके पास जैसे ही गया वो लड़की जोर जोर से रोने लगी और कहने लगी मेरी अम्मी को जगा दीजिये अल्लाह के लिए मेरी अम्मी को जग दीजिये! मैं धीरे धिरे उस महिला कि तरफ अपने हाथबढ़ानेलगा! जैसे ही मैंने उस महिला को अपनी तरफ घुमाया मैं सन सा रह गया! ये वो ही लड़की थी जिसे मैं कल राततक अपने ख्वाबो कि मल्लिका कह कर पुकार रहा था, जिससे मिलने के लिए मुझे एक नए सवेरा का इंतज़ार था और आज वो मेरे सामने घायल और मूर्छित अवस्था में पड़ी हुई थी! जिसके तन के कपडे उधड़े हुए थे, चेहरे पर थप्पड़ो के निशान और पुरा जिस्म मानो लाल रंग में लिपट सा गया था! मैं पागलो कि तरह कभी कुए से पानी लेकर उसके मुह पर छीटें मारता तो कभी केले के पत्तो से उसे हवा करता! ईश्वरकि कृपा से उसके अंदर चेतना आ गयी और धीरे धीरे उसने आंखे खोली! मुझे देख कर वोखुशहो गयी! मानो जैसे उसकी ऑंखें सिर्फ मेरा ही इंतज़ार कर रही थी! उसने अपनी लड़खड़ाहट भरी आवाज में मुझसे कहाँ " ये दुनियां बहुत खुदगर्ज हैयहाँ किसी के भावनाओंकी क़द्र नही कि जाती! औरत को कठपुतली मात्रा समझ जाता है जिसे जब चाहे जो चाहे अपनी मर्जी से नचा सकता है उसके कपडे उतार कर सरे बाजार उसे नोच नोच कर खा सकता है! मुझे प्यार करने का कोई हक़ नही! अल्लाह के लिए मुझे माफ़ कर देना मैंने तुमसे दिल लगाने कि गुस्ताखी कर ली. तुम्हारे प्यार कि मीठी झोंको मेंमैं बहक कर भूल ही गयी थी कि  मैं तो एक बेजुबान सी गुड़िया हूँ जिसे इन नवाबों के हाथो बचपन में ही बेच दिया गया था जिसे अपनी जिंदगी के फैसले लेने का कोई हक़ नही! धीरे धीरे उसने लड़की की तरफ इशारा करते हुए कहाँ ये मेरी बेटी नाज़िया है जिसे मैंने इन लोगो कि गन्दी नज़रो से बचा कर रखा हैं, अल्लाह के वास्ते तुम इसे यहाँ से दूर ले जाओ, इसे ऐसी दुनिया में ले जाओ जहाँ ये अपनी जिंदगी खुल कर जी सके और इन लोगो के आतंको से बच सके मैं तुम्हारा एहसान जिंदगी भर नही भूलूंगी! देखो वो लोग मुझे ले जाने के लिए आते ही होंगे खुदा के लिए अपनी मोहब्बत के लिए नाज़िया को यहाँ से दूर ले जाओ! और इतना कहकर वो बेहोश हो गयी!.
दूर  से कुछ लोगो कि आने कि आहट सुनाई दी! कुछ लोगसैकड़ो कि तादात में हमारी तरफ ही आ रहे थे! मैंने नाज़िया को गौदमें उठाया और भागता रहा भागता रहा जब तक रात ना हुई! अगली सुबह मैं नाज़िया को लेकर शहर निकल गया!
तभी अचानक से आवाज आयी "अब्बू मेरा दुपट्टा" और सहसा मैं अपने खाव्बों से बहार निकल आया! अब्बू आप भी ना अभी तक आपकी आदत नही गयी और यह कहते हुए  उसने मेरे कड़े से अपना दुपट्टा छुड़ाया!
क्या अब्बू  स्टेशन आ गया! अब उतर भी जाइये! मैंने ख़ुद को सँभालते हुए  ट्रैन से नीचे उतरा! मौसम और माहौल सब बदल गया था मानो कि परिवर्तन में हमारा गाँव भी आगे ही था!
सुबह सुबह चाय पीने कि तलब लगी थी तो स्टेशन के पास वाले चाय कि दुकान पर चला गया! इसी बहाने अख़बार भी पढ़ने को मिल गया था! किसी ने आवाज लगाई "साहब क्या लेंगे?"
मैंने कहाँ एक गरमा गरम चाय पीला दे तो बड़ी मेहरबानी होगी!  कुछ देर बाद एक महिला चाय लेकर मेरे पास खड़ी थी और उसने कहाँ “जी जनाब आपकी चाय”! मैं अख़बार पढ़ने में तल्लीन था और बिना मुड़े ही चाय कि गिलास पकड़ने लगा अचानक चाय से भरी हुई गिलास जमीन पर फ़ैल गयी! मैं जैसे ही साफ़ करने को नीचे झुका वैसे ही सामने कि महिला से मेरा सर टकरा गया और गिलास उठाते हुए मैंने उनको कहाँ “माफ़ कीजियेगा गलती से गिर गया”! यह लीजिये आपकी गिलास”! मैं इस चाय के भी पैसे दे दूंगा! उस महिला ने कहाँ जी कोई बात नही मैं आपके लिए दूसरी चाय बना देती हूँ! मैं भी मुस्कुरा कर अपना अख़बार पढ़ने लगा! अचानक से किसी ने आवाज दी "जी जनाब मेरा दुपट्टा.." मेरे हाथो से शहसा अख़बार छूट गया! ये वही आवाज थी जिसको सुनने के लिए मैं तरस गया था!मेरे पैरों में थरथरी सी हो गयी! पुरा बदन जैसे कम्पन कर रहा हो मेरा दिल भर आया आँखों सेआसुओंकीधारा सी छूट गयी! पर पीछे मुड़ कर देखने कि हिम्मत ना हुई डर लगा रहा था मानो ये पल भी कहीहमसे कोई छीन ना ले! जैसे ही उसने मेरी तरफ हाथ बढ़ा कर मेरे कड़े से अपना दुपट्टा छुड़ाने को जैसे ही आगे बढ़ी! मैंने कहाँ  " अजी एक बार अपना नाम तो बताते जाइये आपको देख ना सकेंगे तो कम से कम आपके नाम से तो हमे जीने का बहाना मिल जायेगा"!
उसने मेरी तरफअपनी ढबढबायी हुई नजरों से देख कर बोली “सलमा नाम हैं मेरा” और इतना कहकर मुझसे लिपट कर जोर जोर से रोने लगी! आज हम दोनों एक दूसरे कि बाँहों में थे जहाँ ना कोई सीमा थी ना ही कोई डर! उसने अपनी हकलाती हुई आवाज में कहाँ "तुम जब वहाँ से चले गए तब राहुल ने मुझे वहाँ से छिपते-छिपाते अपने गाँव लेकर आया मुझे देख कर उसके घर वालो ने उसे घर से निकल दिया! फिर हम दूर किसी गाँव मेंअजनबी बनकर गए! राहुल ने मुझे बड़े भाई कीतरह मुझे बहुत संभाला, मुझे उन दरिंदो से बचाया और एकअच्छीऔर नेक जिंदगी दी!  लेकिन खुदा के कहर से कौन बच सका है मलेरिया कि बीमारी ने उनकी २ साल पहले जान ले ली! तबसे मैं अकेले ही इस गाँव में आ गयी! और यहाँ आकर चाय की दुकान खोल ली!औरइस चाय कि दुकान पर बैठ कर तुम्हारे आने कि राह देखने लगी! हर सुबह इसी उमीद से दुकान खोलती कि अब तुम आओगे और आज तुम आही गए खुदा ने मेरी सुन ली! मेरे आँखों से आंसूथम हीनही रहे थे! मैंने कहाँ “ये देखो हमारी बेटी नाज़िया जिसे तुमने उस दिन मेरे हाथों में सौपा थामैं इसे सबसे छिपा कर दूर शहर लाया और मैंने दिन रात मेहनत की और अपनी बेटी को खूब पढ़ाया! आज ये टीचर है और इसी गाँव में ही इसकी पोस्टिंग हुई है! जैसा की तुम चाहती थी मैंने हमारी बेटी को इस काबिल बनाया की वो आगे चलकर और भी लड़कियो का भविष्य बदल सके”! तीनो एक साथ एक दूसरे के गले लग जाते है!

 YiQ7-Jhwl3k

Jyoti Gupta

  The Unbroken Spirit: Shalini's Turbulent Journey   Shalini, a radiant star in her school's constellation, was more than just a b...