रोज सुबह जब खुद को देखूं कुछ सुना सा पाती हूँ।
मन के एक विव्हल कोने में कुछ अधूरा सा पाती हूँ।।
लगते सब अपने सच्चे है, पर ये तो आँखों का धोखा है।
मत खोज निगाहें तू उनको, ये भ्रम दुनियां का झोँका हैं।।
बड़ी विघ्न समस्या जीवन की धीरे से घात जमाती है।
दुनियां की ताल-तल्लैया में सबको ये नाच नचाती है।।
क्या जिक्र करूँ खुद का खुद से, हरबार नया कुछ पाती हूँ।
दुनियां के रंगी इस मेले में, मैं खुद को ही अकेला पाती हूँ।।
नाहक लोग बात बनाते है, कुछ तीखा व्यंग सुनाते है ।
अपमान होता है गिरधर जब अपने कटाक्ष कर जाते है।।
भारी विपदा है मन की, किस-किस को ये समझाऊं मैं।
और भीतर की उमड़ती ज्वाला को, कैसे शांत कराऊँ मैं।।
मन के एक विव्हल कोने में कुछ अधूरा सा पाती हूँ।।
लगते सब अपने सच्चे है, पर ये तो आँखों का धोखा है।
मत खोज निगाहें तू उनको, ये भ्रम दुनियां का झोँका हैं।।
बड़ी विघ्न समस्या जीवन की धीरे से घात जमाती है।
दुनियां की ताल-तल्लैया में सबको ये नाच नचाती है।।
क्या जिक्र करूँ खुद का खुद से, हरबार नया कुछ पाती हूँ।
दुनियां के रंगी इस मेले में, मैं खुद को ही अकेला पाती हूँ।।
नाहक लोग बात बनाते है, कुछ तीखा व्यंग सुनाते है ।
अपमान होता है गिरधर जब अपने कटाक्ष कर जाते है।।
भारी विपदा है मन की, किस-किस को ये समझाऊं मैं।
और भीतर की उमड़ती ज्वाला को, कैसे शांत कराऊँ मैं।।

Jyoti Gupta
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