इस विरह वेदना में, खुद को तड़पाती हूँ,
तुझसे मिलने के सौ बहाने, मैं बनाती हूँ।
मैं समझ ना पायी थी तुमको,
जब बिछडन-बिछडन कहते थे|
धीरे-धीरे खुद को मुझसे,
दूर तुम जो पल-पल करते थे|
मैं समझ सकी न तेरी माया,
जब तू झूठे वादें करता था|
और पर स्त्री से छिप कर,
तू घंटो भर बातें करता था|
तेरी एक मुस्कान पर मैं,
तेरी जोगन बन बैठी थी|
और तेरी दर्शन के खातिर,
मेरी अँखियाँ तरसा करती थी|
ज्योति गुप्ता
jcreativesilverproduction@gmail.com

तुझसे मिलने के सौ बहाने, मैं बनाती हूँ।
मैं समझ ना पायी थी तुमको,
जब बिछडन-बिछडन कहते थे|
धीरे-धीरे खुद को मुझसे,
दूर तुम जो पल-पल करते थे|
मैं समझ सकी न तेरी माया,
जब तू झूठे वादें करता था|
और पर स्त्री से छिप कर,
तू घंटो भर बातें करता था|
तेरी एक मुस्कान पर मैं,
तेरी जोगन बन बैठी थी|
और तेरी दर्शन के खातिर,
मेरी अँखियाँ तरसा करती थी|
ज्योति गुप्ता
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