काली-चंडी, अल्का-दुर्गा, मैं सबकी एक ही महिमा हूँ।
मैं सृस्टि हूँ, मैं दृस्टि हूँ, मैं ही तेरी संरचना हूँ।।
विघटित भी मैं संगठित भी मैं, मैं काल की काली कल्पना हूँ।
तू मान सके तो मान की मैं ईश्वर की सुन्दर रचना हूँ।।
नभ, जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी, पंच तत्वों का मिश्रण मैं हूँ।
अवलोकन हूँ आधार भी हूँ अगणित समाज की सूत्रधार भी हूँ ।।
दर्पण भी मैं, अर्पण भी मैं, सौभाग्य की सारी कल्पना हूँ।
तू मान सके तो मान की मैं ईश्वर की सुन्दर रचना हूँ।।
ज्योति गुप्ता
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