
पंडित जी के मंत्रो से मंडप गूंज रहा था। भावुकता से भरी हुई मेरी माँ की ऑंखें आंसुओं की मोती से टिमटिमा रही थी। उनके मुख मंडल पर विराजित उस भाव से मैं उनकी ख़ुशी का आभास कर रही थी। मेरा ह्रदय उत्साहित था।एक तरफ सबसे बिछड़ने जाने का गम था तो दूसरी तरफ जिंदगी की नई शुरुआत मेरी राहें देख रही थी। चारों तरफ खुशियों का माहौल था मेरे पिता जी को तो जैसे उन्हें उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी से मुक्ति मिल गयी हो या यूँ कह लो कि उनका कोई अधूरा सपना पूरा हो गया हो लेकिन अभी भी कुछ खाली सा था। इतने दिनों तक मैंने जो भी अर्जित किया था, जो भी संचित किया था, ऐसा लग रहा था मानो कि मंडप में प्रज्वल्लित उस अग्नि में, मैं एक-एक करके अपने ख्वाबों और अरमानों की आहुति दे रही हूँ।
सहसा अम्मा की आवाज आई "बिटियां तुम्हारे पापा आये हैं" और इतना सुनकर मैं अपनी सपनों की दुनियां से जाग खड़ी हुई। मन की विव्हळता ऐसी थी कि मानों जो भी मैंने सपना देखा वो सच था। मैंने अपना बैग और कागज का लिफाफा उठाया और वेटिंग रूम की तरफ गयी जहाँ मेरे पिताजी मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
पिता जी सामने कुर्सी पर बैठे हुए थे। मैं उनको देख कर झट गले लगने के लिए उनकी तरफ दौड़ी परन्तु मेरे आगे बढ़ने से ही उन्होंने कहा "अरे बेटा मैं कबसे तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ, जल्दी चलो वर्ना हमारी ट्रैन छूट जाएगी।" अपने पिता जी कि ये बात सुनकर मैं उदास हो गई और उनसे कुछ कहे ब्गैर मैं उनके साथ स्टेशन कि तरफ चल पड़ी। सफर में हमने एक दूसरे से कोई बात नहीं की। पिता जी अपने अख़बार में व्यस्त थे और मैं अपने ख्यालों में। मैं उनसे बहुत कुछ कहना चाहती थी पर कुछ कह पाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अभी मैं इसी असमंजस में थी की हमारा स्टेशन आ गया। मैंने जैसे ही ट्रैन से उतरकर स्टेशन पर ज्यों ही पैर रखा, ढोल-नगाड़ों की आवाज गुजने लगी। स्टेशन पर खड़ा निहाल और शेखर मुझे देखते ही देखते अपने कंधे पर बिठा लिया और चारों तरफ बधाइयों दी जाने लगी। मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा कि जो बात मैं अपने पिता जी से कहना चाहती थी वो बात उन्हें पहले से ही पता है। मेरे आँखों से आसुओं की धरा निकलने लगी। खुशी-खुशी हम घर पहुंचे। घर पंहुचा तो नज़ारा ही कुछ अलग था। मेरा पूरा घर फूलों और लड़ियों से सजा हुआ था। सारे रिश्तेदारों का घर पर ताता लगा हुआ था| अचानक से मेरे चाचा कि बेटियां दौड़ती हुई मेरे गले लग गयी। और माँ आरती कि थाल से मेरी आरती उतारने लगी।
माँ ये सब छोडो भी क्या कर रही हो?
तू नहीं समझेगी, मैं तेरी नज़र उतार रही हूं ताकि तुम्हे किसी कि नज़र ना लगे। ओफ्हो माँ आप भी ना.. अच्छा माँ ये घर इतना सजाया क्यों गया है? मैं कलक्टर बनी हूँ इसी की खुशी मे यह सब आयोजित किया है या फिर कही मेरी शादी तो नही कर रहे। जैसे ही मेरे वाक्य पुरे हुऐ कि माँ ने अचंभित होकर मेरी तरफ देखा और कहाँ " हाँ बिलकुल सही कहाँ सुशीला तीन दिन में तुम्हारी शादी है। लड़का बहुत अच्छा है, अच्छे पैसे कामता है और नामी गिरामी परिवार है, तुम्हे हर तरफ से सुखी रखेगा.. कलक्टरी में क्या रखा है। अब जा जाकर मुँह हाथ धो ले, और कुछ खा ले, अभी बहुत सारी रश्में करनी बाकी है।" माँ की बातें सुनकर मेरा मन स्थिर हो गया। मैं शून्य अवस्था में चली गयी और जिस लिफाफे को पकडे हुए मैं कॉलेज से घर तक आयी वो तिनके की भांति मेरे हाथ से छूट कर दरवाजे की चौखट पर जा गिरा।|
शादी की सारी रश्में शुरू हो गयी। हल्दी की रश्म, फिर मेहँदी की। ढोल-नगाड़े बजने लगे, लोगो का आना- जाना शुरू हो गया। निहारिका मुझे मंडप में ले जाने के लिए आयी। मेरी सारी सहेलियां खुश थी। कोई मुझे छेड़ता तो कोई मुझे बातें कहता। मंडप पंडित जी के मंत्रो से गूंज उठा। चारों तरफ खुशहाली थी| भावुकता से भरी हुई मेरी माँ की ऑंखें आंसुओं की मोती से टिमटिमा रही थी। उनके मुख मंडल पर विराजित उस भाव से मैं उनकी ख़ुशी का आभास कर रही थी। मेरा ह्रदय शान्त था। ना ही मुझे किसी से बिछड़ने का गम था और नाहीं दूसरी तरफ जिंदगी की नई शुरुआत करने की खुशी थी। चारों तरफ खुशियों का माहौल था मेरे पिता जी को तो जैसे उन्हें उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी से मुक्ति मिल गयी हो या यूँ कह लो कि उनका कोई अधूरा सपना पूरा हो गया हो लेकिन अब सब कुछ खाली सा था। इतने दिनों तक मैंने जो भी अर्जित किया था, जो भी संचित किया था, ऐसा लग रहा था मानो की मंडप में प्रज्वल्लित उस अग्नि में, मैं एक-एक करके अपने ख्वाबों और अरमानों की आहुति दे रही हूँ।
सहसा अम्मा की आवाज आई "बिटियां तुम्हारे पापा आये हैं" और इतना सुनकर मैं अपनी सपनों की दुनियां से जाग खड़ी हुई। मन की विव्हळता ऐसी थी कि मानों जो भी मैंने सपना देखा वो सच था। मैंने अपना बैग और कागज का लिफाफा उठाया और वेटिंग रूम की तरफ गयी जहाँ मेरे पिताजी मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
पिता जी सामने कुर्सी पर बैठे हुए थे। मैं उनको देख कर झट गले लगने के लिए उनकी तरफ दौड़ी परन्तु मेरे आगे बढ़ने से ही उन्होंने कहा "अरे बेटा मैं कबसे तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ, जल्दी चलो वर्ना हमारी ट्रैन छूट जाएगी।" अपने पिता जी कि ये बात सुनकर मैं उदास हो गई और उनसे कुछ कहे ब्गैर मैं उनके साथ स्टेशन कि तरफ चल पड़ी। सफर में हमने एक दूसरे से कोई बात नहीं की। पिता जी अपने अख़बार में व्यस्त थे और मैं अपने ख्यालों में। मैं उनसे बहुत कुछ कहना चाहती थी पर कुछ कह पाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अभी मैं इसी असमंजस में थी की हमारा स्टेशन आ गया। मैंने जैसे ही ट्रैन से उतरकर स्टेशन पर ज्यों ही पैर रखा, ढोल-नगाड़ों की आवाज गुजने लगी। स्टेशन पर खड़ा निहाल और शेखर मुझे देखते ही देखते अपने कंधे पर बिठा लिया और चारों तरफ बधाइयों दी जाने लगी। मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा कि जो बात मैं अपने पिता जी से कहना चाहती थी वो बात उन्हें पहले से ही पता है। मेरे आँखों से आसुओं की धरा निकलने लगी। खुशी-खुशी हम घर पहुंचे। घर पंहुचा तो नज़ारा ही कुछ अलग था। मेरा पूरा घर फूलों और लड़ियों से सजा हुआ था। सारे रिश्तेदारों का घर पर ताता लगा हुआ था| अचानक से मेरे चाचा कि बेटियां दौड़ती हुई मेरे गले लग गयी। और माँ आरती कि थाल से मेरी आरती उतारने लगी।
माँ ये सब छोडो भी क्या कर रही हो?
तू नहीं समझेगी, मैं तेरी नज़र उतार रही हूं ताकि तुम्हे किसी कि नज़र ना लगे। ओफ्हो माँ आप भी ना.. अच्छा माँ ये घर इतना सजाया क्यों गया है? मैं कलक्टर बनी हूँ इसी की खुशी मे यह सब आयोजित किया है या फिर कही मेरी शादी तो नही कर रहे। जैसे ही मेरे वाक्य पुरे हुऐ कि माँ ने अचंभित होकर मेरी तरफ देखा और कहाँ " हाँ बिलकुल सही कहाँ सुशीला तीन दिन में तुम्हारी शादी है। लड़का बहुत अच्छा है, अच्छे पैसे कामता है और नामी गिरामी परिवार है, तुम्हे हर तरफ से सुखी रखेगा.. कलक्टरी में क्या रखा है। अब जा जाकर मुँह हाथ धो ले, और कुछ खा ले, अभी बहुत सारी रश्में करनी बाकी है।" माँ की बातें सुनकर मेरा मन स्थिर हो गया। मैं शून्य अवस्था में चली गयी और जिस लिफाफे को पकडे हुए मैं कॉलेज से घर तक आयी वो तिनके की भांति मेरे हाथ से छूट कर दरवाजे की चौखट पर जा गिरा।|
शादी की सारी रश्में शुरू हो गयी। हल्दी की रश्म, फिर मेहँदी की। ढोल-नगाड़े बजने लगे, लोगो का आना- जाना शुरू हो गया। निहारिका मुझे मंडप में ले जाने के लिए आयी। मेरी सारी सहेलियां खुश थी। कोई मुझे छेड़ता तो कोई मुझे बातें कहता। मंडप पंडित जी के मंत्रो से गूंज उठा। चारों तरफ खुशहाली थी| भावुकता से भरी हुई मेरी माँ की ऑंखें आंसुओं की मोती से टिमटिमा रही थी। उनके मुख मंडल पर विराजित उस भाव से मैं उनकी ख़ुशी का आभास कर रही थी। मेरा ह्रदय शान्त था। ना ही मुझे किसी से बिछड़ने का गम था और नाहीं दूसरी तरफ जिंदगी की नई शुरुआत करने की खुशी थी। चारों तरफ खुशियों का माहौल था मेरे पिता जी को तो जैसे उन्हें उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी से मुक्ति मिल गयी हो या यूँ कह लो कि उनका कोई अधूरा सपना पूरा हो गया हो लेकिन अब सब कुछ खाली सा था। इतने दिनों तक मैंने जो भी अर्जित किया था, जो भी संचित किया था, ऐसा लग रहा था मानो की मंडप में प्रज्वल्लित उस अग्नि में, मैं एक-एक करके अपने ख्वाबों और अरमानों की आहुति दे रही हूँ।
हाँ सच मे, मैं आहुति दे रही हूँ।
ज्योति गुप्ता
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