अच्छा लगता है

हैं पड़ी बेड़ियाँ पाओं में, सपनो पर सर्वाधिकार नहीं।
ना रोक सकूँ खुद के मन को, क्या करुँ वो निराधार नहीं।।
कितनी पाबंदियां हो जीने में, अच्छा लगता है।
क्या करूँ साहिब लाचार हूँ आदत से, पर लिखना, अच्छा लगता है।।

तन घायल है मन पीड़ित है, फिर भी हार का नाम नहीं।
अपनी इच्छा से बढ़ना है, जीना है ये कोई अपराध नहीं।।
काले बादल विघटित करके जब, सूरज आसमां से निकलता है, अच्छा लगता है ।
क्या करूँ साहिब लाचार हूँ आदत से, पर लिखना अच्छा लगता है।।

चाहे छिन लो आभूषण मेरे या, सितम की बारिश बरसा दो।
चाहे छिन लो कलम ये मेरी. या चाहे मुझको कहीं दफना दो।।
अब बंद पिंजड़े में भी जीना, अच्छा लगता हैं।
क्या करूँ साहिब लाचार हूँ आदत से, पर लिखना अच्छा लगता है।।
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ज्योति गुप्ता
jcreativesilverproduction@gmail.com



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