सब साहस से अर्जित है वो, पर हर खुशियों से वचिंत है वो
ऐसी ही कुछ भवसागर की नईयां, मैं बैठी है वो
चुपचाप सी गुमसुम सी होकर, एक टक वो मुझको देख रही
ऐसा लगता भीतर-भीतर, वो मुझसे ही कुछ है पुछ रही
ऐ री सखी मुझे इतना बता, क्या सच मे यहां अब इंसान नही
जहाँ पूजा होती कान्हा की, क्या अब वो पालनहार नही
रोज़ी-रोटी के खातिर ही, मै घर से अकसर बाहर जाती हूं
और नन्ही सी जान को अपने छोड़, बाजार को आती हूं
काम पर जाऊं जब अपने, लाला मुझे आंख दिखाता है
और जब-जब चाहे दिल उसका, मुझे कच्चा नोच के खाता है
अपने ज़ख्मों के दर्द लिए, मै वापिस जब घर को आती हूं
अकसर हर आदमी कहते है, कब मेरी गली तुम आती हो?
ना मुझे तिरस्कार की वेदना है, ना ही है अब अपमान का भय
अब लोक लाज का आंचल छोड़ मैं भी बोलूं ये संसय
होती मैं रचनाकार अगर, मैं लिखती गाथा इस दुनियां की
मीठा बोलूं अनिरंकार नही, ना ही खैरात हूं इस दुनियां की
बच सकते हो तो बचो लोगों, जिस दिन बिजली बन जाऊंगी
फिर त्राहि-त्राहि कर जाऊंगी, बस त्राहि-त्राहि बन जीऊंगी


Jyoti Gupta