वर्जनिटी बचाई है..


साधारण सी एक कन्या को कपड़ो से सजाया जाता है|
और चार लोगो के बीच खड़ा कर, उसका अपमान कराया जाता है||
संस्कारों और तहजीबों के बीच, लड़की जब-जब पिसाई है|
तभी अनायास कोई पूछता है, क्या तुमने अपनी वर्जनिटी बचाई है||
औरत तो नाम की पुतली है, इधर से उधर नचाई जाती है|
जो कल पिता के कंधे पर घूमती थी, आज जूतों से धुलाई जाती है||
आँखों में लाज बचा कर रखना, लड़की को ये बान सिखाई है|
और बेबाक जरा हॅसने पर कहे- क्या तुमने अपनी वर्जनिटी 
बचाई है||
मैं उन्मुक्त ख्यालों वाली हूँ मुझको ना है किसी बात का भय|
मैं जीती हूँ अपने शर्तो पर, फिर मुझे वर्जिनिटी का क्या भय||
है चरित्र मेरा निष्छल- निर्गुण, स्वामिनी हूँ मैं अपने आदर्शो की|
तोड़ डालूंगी सारी बेड़िया गर, परिभाषित किया मुझे वर्जिनिटी के पैमानो की||
कलंकित कुछ पुरुष प्रधान जो है, मौका देख कर टूट जाते है|
और हवश की चादर में खुद की बेटी को भी खा जाते है||
ऐसे- ऐसे लोगो की जब ग्रन्थ कही लिखी जाएगी|
फिर महिलाओं का समाज तेरी वर्जिनिटी चेक कर आएगी||


Jyoti Gupta


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